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साखी |1|

आवो मिलो जुमलै जुलो, सिंवरो सिरजणहर।

सतगुरू सतपंथ चालिया,खरतर खाण्डे धार।

जम्भेश्वर जिभिया जपो, भीतर छोड़ विकार।

सम्पत्ति सिरजणहर की, विधिसूं सुणों विचार।

अवसर ढील न कीजिए, भले न लाभे वार।

जमराजा वासे बह तलबी कियो तैयार।

चहरी वस्तु न चाखियो उर पर तज अहंकार।

बाड़े हूतां बीछड़या जारी सतगुरू करसी सार।

सेरी सिवरण प्राणियां अन्तर बड़ो आधार।

पर निंदा पापां सिरे भूल उठाये भार।

परलै होसी पाप सूं मूरख सहसी मार।

पाछे ही पछतावसी पापां तणी पहार।

ओगण गारो आदमी इला रहे उरभार।

कह केसो करणी करो पावो मोक्ष द्वार।




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